शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

हरिजन गाथा / नागार्जुन





हरिजन गाथा / नागार्जुन
(एक)

ऎसा तो कभी नहीं हुआ था !
महसूस करने लगीं वे
एक अनोखी बेचैनी
एक अपूर्व आकुलता
उनकी गर्भकुक्षियों के अन्दर
बार-बार उठने लगी टीसें
लगाने लगे दौड़ उनके भ्रूण
अंदर ही अंदर
ऎसा तो कभी नहीं हुआ था

ऎसा तो कभी नहीं हुआ था कि
हरिजन-माताएं अपने भ्रूणों के जनकों को
खो चुकी हों एक पैशाचिक दुष्कांड में
ऎसा तो कभी नहीं हुआ था...

ऎसा तो कभी नहीं हुआ था कि
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं--
तेरह के तेरह अभागे--
अकिंचन मनुपुत्र
ज़िन्दा झोंक दिये गये हों
प्रचण्ड अग्नि की विकराल लपटों में
साधन सम्पन्न ऊंची जातियों वाले
सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा !
ऎसा तो कभी नहीं हुआ था...

ऎसा तो कभी नहीं हुआ था कि
महज दस मील दूर पड़ता हो थाना
और दारोगा जी तक बार-बार
ख़बरें पहुंचा दी गई हों संभावित दुर्घटनाओं की

और, निरन्तर कई दिनों तक
चलती रही हों तैयारियां सरेआम
(किरासिन के कनस्तर, मोटे-मोटे लक्क्ड़,
उपलों के ढेर, सूखी घास-फूस के पूले
जुटाये गए हों उल्लासपूर्वक)
और एक विराट चिताकुंड के लिए
खोदा गया हो गड्ढा हंस-हंस कर
और ऊंची जातियों वाली वो समूची आबादी
आ गई हो होली वाले 'सुपर मौज' मूड में
और, इस तरह ज़िन्दा झोंक दिए गए हों

तेरह के तेरह अभागे मनुपुत्र
सौ-सौ भाग्यवान मनुपुत्रों द्वारा
ऎसा तो कभी नहीं हुआ था...
ऎसा तो कभी नहीं हुआ था...


(दो)


चकित हुए दोनों वयस्क बुजुर्ग
ऎसा नवजातक
न तो देखा था, न सुना ही था आज तक !
पैदा हुआ है दस रोज़ पहले अपनी बिरादरी में
क्या करेगा भला आगे चलकर ?
रामजी के आसरे जी गया अगर
कौन सी माटी गोड़ेगा ?
कौन सा ढेला फोड़ेगा ?
मग्गह का यह बदनाम इलाका
जाने कैसा सलूक करेगा इस बालक से
पैदा हुआ बेचारा--
भूमिहीन बंधुआ मज़दूरों के घर में
जीवन गुजारेगा हैवान की तरह
भटकेगा जहां-तहां बनमानुस-जैसा
अधपेटा रहेगा अधनंगा डोलेगा
तोतला होगा कि साफ़-साफ़ बोलेगा
जाने क्या करेगा
बहादुर होगा कि बेमौत मरेगा...
फ़िक्र की तलैया में खाने लगे गोते
वयस्क बुजुर्ग दोनों, एक ही बिरादरी के हरिजन
सोचने लगे बार-बार...
कैसे तो अनोखे हैं अभागे के हाथ-पैर
राम जी ही करेंगे इसकी खैर
हम कैसे जानेंगे, हम ठहरे हैवान
देखो तो कैसा मुलुर-मुलुर देख रहा शैतान !
सोचते रहे दोनों बार-बार...

हाल ही में घटित हुआ था वो विराट दुष्कांड...
झोंक दिए गए थे तेरह निरपराध हरिजन
सुसज्जित चिता में...

यह पैशाचिक नरमेध
पैदा कर गया है दहशत जन-जन के मन में
इन बूढ़ों की तो नींद ही उड़ गई है तब से !
बाकी नहीं बचे हैं पलकों के निशान
दिखते हैं दृगों के कोर ही कोर
देती है जब-तब पहरा पपोटों पर
सील-मुहर सूखी कीचड़ की

उनमें से एक बोला दूसरे से
बच्चे की हथेलियों के निशान
दिखलायेंगे गुरुजी से
वो ज़रूर कुछ न कु़छ बतलायेंगे
इसकी किस्मत के बारे में

देखो तो ससुरे के कान हैं कैसे लम्बे
आंखें हैं छोटी पर कितनी तेज़ हैं
कैसी तेज़ रोशनी फूट रही है इन से !
सिर हिलाकर और स्वर खींच कर
बुद्धू ने कहा--
हां जी खदेरन, गुरु जी ही देखेंगे इसको
बताएंगे वही इस कलुए की किस्मत के बारे में
चलो, चलें, बुला लावें गुरु महाराज को...

पास खड़ी थी दस साला छोकरी
दद्दू के हाथों से ले लिया शिशु को
संभल कर चली गई झोंपड़ी के अन्दर

अगले नहीं, उससे अगले रोज़
पधारे गुरु महाराज
रैदासी कुटिया के अधेड़ संत गरीबदास
बकरी वाली गंगा-जमनी दाढ़ी थी
लटक रहा था गले से
अंगूठानुमा ज़रा-सा टुकड़ा तुलसी काठ का
कद था नाटा, सूरत थी सांवली
कपार पर, बाईं तरफ घोड़े के खुर का
निशान था
चेहरा था गोल-मटोल, आंखें थीं घुच्ची
बदन कठमस्त था...
ऎसे आप अधेड़ संत गरीबदास पधारे
चमर टोली में...

'अरे भगाओ इस बालक को
होगा यह भारी उत्पाती
जुलुम मिटाएंगे धरती से
इसके साथी और संघाती

'यह उन सबका लीडर होगा
नाम छ्पेगा अख़बारों में
बड़े-बड़े मिलने आएंगे
लद-लद कर मोटर-कारों में

'खान खोदने वाले सौ-सौ
मज़दूरों के बीच पलेगा
युग की आंचों में फ़ौलादी
सांचे-सा यह वहीं ढलेगा

'इसे भेज दो झरिया-फरिया
मां भी शिशु के साथ रहेगी
बतला देना, अपना असली
नाम-पता कुछ नहीं कहेगी

'आज भगाओ, अभी भगाओ
तुम लोगों को मोह न घेरे
होशियार, इस शिशु के पीछे
लगा रहे हैं गीदड़ फेरे

'बड़े-बड़े इन भूमिधरों को
यदि इसका कुछ पता चल गया
दीन-हीन छोटे लोगों को
समझो फिर दुर्भाग्य छ्ल गया

'जनबल-धनबल सभी जुटेगा
हथियारों की कमी न होगी
लेकिन अपने लेखे इसको
हर्ष न होगा, गमी न होगी

'सब के दुख में दुखी रहेगा
सबके सुख में सुख मानेगा
समझ-बूझ कर ही समता का
असली मुद्दा पहचानेगा

'अरे देखना इसके डर से
थर-थर कांपेंगे हत्यारे
चोर-उचक्के-गुंडे-डाकू
सभी फिरेंगे मारे-मारे

'इसकी अपनी पार्टी होगी
इसका अपना ही दल होगा
अजी देखना, इसके लेखे
जंगल में ही मंगल होगा

'श्याम सलोना यह अछूत शिशु
हम सब का उद्धार करेगा
आज यह सम्पूर्ण क्रान्ति का
बेड़ा सचमुच पार करेगा

'हिंसा और अहिंसा दोनों
बहनें इसको प्यार करेंगी
इसके आगे आपस में वे
कभी नहीं तकरार करेंगी...'

इतना कहकर उस बाबा ने
दस-दस के छह नोट निकाले
बस, फिर उसके होंठों पर थे
अपनी उंगलियों के ताले

फिर तो उस बाबा की आंखें
बार-बार गीली हो आईं
साफ़ सिलेटी हृदय-गगन में
जाने कैसी सुधियां छाईं

नव शिशु का सिर सूंघ रहा था
विह्वल होकर बार-बार वो
सांस खींचता था रह-रह कर
गुमसुम-सा था लगातार वो

पांच महीने होने आए
हत्याकांड मचा था कैसा !
प्रबल वर्ग ने निम्न वर्ग पर
पहले नहीं किया था ऐसा !

देख रहा था नवजातक के
दाएं कर की नरम हथेली
सोच रहा था-- इस गरीब ने
सूक्ष्म रूप में विपदा झेली

आड़ी-तिरछी रेखाओं में
हथियारों के ही निशान हैं
खुखरी है, बम है, असि भी है
गंडासा-भाला प्रधान हैं

दिल ने कहा-- दलित माओं के
सब बच्चे अब बागी होंगे
अग्निपुत्र होंगे वे अन्तिम
विप्लव में सहभागी होंगे

दिल ने कहा--अरे यह बच्चा
सचमुच अवतारी वराह है
इसकी भावी लीलाओं की
सारी धरती चरागाह है

दिल ने कहा-- अरे हम तो बस
पिटते आए, रोते आए !
बकरी के खुर जितना पानी
उसमें सौ-सौ गोते खाए !

दिल ने कहा-- अरे यह बालक
निम्न वर्ग का नायक होगा
नई ऋचाओं का निर्माता
नए वेद का गायक होगा

होंगे इसके सौ सहयोद्धा
लाख-लाख जन अनुचर होंगे
होगा कर्म-वचन का पक्का
फ़ोटो इसके घर-घर होंगे

दिल ने कहा-- अरे इस शिशु को
दुनिया भर में कीर्ति मिलेगी
इस कलुए की तदबीरों से
शोषण की बुनियाद हिलेगी

दिल ने कहा-- अभी जो भी शिशु
इस बस्ती में पैदा होंगे
सब के सब सूरमा बनेंगे
सब के सब ही शैदा होंगे

दस दिन वाले श्याम सलोने
शिशु मुख की यह छ्टा निराली
दिल ने कहा--भला क्या देखें
नज़रें गीली पलकों वाली
थाम लिए विह्वल बाबा ने
अभिनव लघु मानव के मृदु पग
पाकर इनके परस जादुई

भूमि अकंटक होगी लगभग
बिजली की फुर्ती से बाबा
उठा वहां से, बाहर आया
वह था मानो पीछे-पीछे
आगे थी भास्वर शिशु-छाया

लौटा नहीं कुटी में बाबा
नदी किनारे निकल गया था
लेकिन इन दोनों को तो अब
लगता सब कुछ नया-नया था

(तीन)


'सुनते हो' बोला खदेरन
बुद्धू भाई देर नहीं करनी है इसमें
चलो, कहीं बच्चे को रख आवें...
बतला गए हैं अभी-अभी
गुरु महाराज,
बच्चे को मां-सहित हटा देना है कहीं
फौरन बुद्धू भाई !'...
बुद्धू ने अपना माथा हिलाया
खदेरन की बात पर
एक नहीं, तीन बार !
बोला मगर एक शब्द नहीं
व्याप रही थी गम्भीरता चेहरे पर
था भी तो वही उम्र में बड़ा
(सत्तर से कम का तो भला क्या रहा होगा !)
'तो चलो !
उठो फौरन उठो !
शाम की गाड़ी से निकल चलेंगे
मालूम नहीं होगा किसी को...
लौटने में तीन-चार रोज़ तो लग ही जाएंगे...
'बुद्धू भाई तुम तो अपने घर जाओ
खाओ,पियो, आराम कर लो
रात में गाड़ी के अन्दर जागना ही तो पड़ेगा...
रास्ते के लिए थोड़ा चना-चबेना जुटा लेना
मैं इत्ते में करता हूं तैयार
समझा-बुझा कर
सुखिया और उसकी सास को...'

बुद्धू ने पूछा, धरती टेक कर
उठते-उठते--
'झरिया,गिरिडिह, बोकारो
कहां रखोगे छोकरे को ?
वहीं न ? जहां अपनी बिरादरी के
कुली-मज़ूर होंगे सौ-पचास ?
चार-छै महीने बाद ही
कोई काम पकड़ लेगी सुखिया भी...'
और, फिर अपने आप से
धीमी आवाज़ में कहने लगा बुद्धू
छोकरे की बदनसीबी तो देखो
मां के पेट में था तभी इसका बाप भी
झोंक दिया गया उसी आग में...
बेचारी सुखिया जैसे-तैसे पाल ही लेगी इसको
मैं तो इसे साल-साल देख आया करूंगा
जब तक है चलने-फिरने की ताकत चोले में...
तो क्या आगे भी इस कलु॒ए के लिए
भेजते रहेंगे खर्ची गुरु महाराज ?...

बढ़ आया बुद्धू अपने छ्प्पर की तरफ़
नाचते रहे लेकिन माथे के अन्दर
गुरु महाराज के मुंह से निकले हुए
हथियारों के नाम और आकार-प्रकार
खुखरी, भाला, गंडासा, बम तलवार...
तलवार, बम, गंडासा, भाला, खुखरी...

(१९७७ में रचित,'खिचड़ी विप्लव देखा हमने' नामक संग्रह से)



लेख: विजय गौड़


साहित्य में दलित धारा की वर्तमान चेतना ने दलितोद्धार की दया, करूणा वाली अवधारणा को ही चुनौती नहीं दी बल्कि जातीय आधार पर अपनी पहचान को आरोपित ढंग से चातुवर्ण वाली व्यवस्था में शामिल होने को संदेह की दृष्टि से देखना शुरू किया है। दलित धारा के चर्चित विद्धान कांचा ऐलयया की पुस्तक ’व्हाई आई एम नॉट हिन्दू’ इसका स्पष्ट साक्ष्य है। वहीं हिन्दी की दलित धारा के विद्वान ओम प्रकाश वाल्मिकी की पुस्तक ’सफ़ाई देवता’ को भी देखा जा सकता है। चातुवर्णय व्यवस्था की मनुवादी अवधारणा को सिरे से खारिज करते हुए दलितों को शूद्र मानने से दोनों ही विद्वान इंकार करते हैं। हिन्दी साहित्य में दलित धारा का शुरूआती दौर इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है, इसीलिए वह प्रेमचन्द के आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद से भी टकराता रहा है। यानी वह घर्षण-संघर्ष जो अभी तक की स्थापित मान्यताओं को चुनौती दे रहा है, दलित धारा की वर्तमान चेतना के आलोचना के औजार को और पैना करने की दृष्टि से सम्पन्न माना जा सकता है। दलितोद्धार की दया, करूणा वाली अवधारणा, जो ’हरिजन’ शब्दावली के रूप में सामने आई, वह भी अब अस्वीकार्य हुई है। यहाँ अभी तक के प्रगतिशील विचार पर शक नहीं, पर उसकी सीमाओं को भी चिह्नित किया जा सकता है। बात को थोड़ा और स्पष्ट करते हुए कहें तो दलित साहित्य ने उस भारतीय समाज की सीवनों को उधेड़ना शुरू कर दिया है जो पूंजीवादी विकास के आधे-अधूरे छद्म और सामंती गठजोड़ पर टिका है। यहाँ दलित धारा की इस चेतना पर भी सवाल उठा हुआ है कि इस सच को उद्घाटित कर देने के बाद सामाजिक बदलाव के संघर्ष की उसकी दिशा कैसे अलग है?

यह सारे सवाल जिन कारणों से मौजू हुए हैं उसमें नागार्जुन की कविता ’हरिजन गाथा’ का मेरा पाठ कुछ ऐसे ही सवालों के साथ है। लेकिन यहाँ यह बात भी साफ़ है कि ’हरिजन गाथा’ के उन प्रगतिशील तत्वों को अनदेखा नहीं किया जा सकता जो उसके रचे जाने के वक़्त तक मौजू थे। जैसे लाख तर्क-वितर्क के बाद भी प्रेमचंद के रचना-संसार में दलितों के प्रति मानवीय मूल्यों को दरकिनार करना संभव नहीं, वैसे ही
’हरिजन गाथा’ के उस उत्स से इंकार नहीं किया जा सकता जो उसके रचे जाने की वजह है और जिसमें जातिगत आधार पर होने वाले नरसंहारों का निषेध है।

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था, बावजूद इसके जो कुछ भी हुआ था, वह अमानवीय था। यातनादायक। हरिजन गाथा ऐसे ही नरसंहार को निशाने पर रखती है और उन स्थितियों की ओर भी संकेत करती है जो इस अमानवीयता के खिलाफ एक नये युग का सूत्रपात जैसी ही हैं।

चकित हुए दोनों वयस्क बुजुर्ग
ऐसा नवजातक
न तो देखा था, न सुना ही था आज तक !

जीवन के उल्लास का यह रंग जिस अमानवीय और हिंसक प्रवृत्ति के कारण है यदि उसे ’हरिजन गाथा’ में ही देखें तभी इसके होने की संभावनाओं पर चकित होते वृद्धों की आशंका को समझा जा सकता है।

यातनादायी, अमानवीय जीवन के खिलाफ़ शुरू हुए दलित उभार को देखें तो उसकी उस हिंसक प्रवृत्ति को भी समझा जा सकता है जो शुरूआती दौर में राजनीतिक नारे के रूप में "तिलक, तराजू और तलवार" जैसी आक्रामकता के साथ दिखाई दी थी और साहित्य में प्रेमचंद की कहानी ’कफ़न’ पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाते हुए अभिव्यक्त हुई थी। यह अलग बात है कि अब न तो साहित्य में और न ही राजनीति में दलित उभार की वह आक्रामकता दिखाई दे रही है। वह उसी रूप में रह भी नहीं सकती थी। उसे तो और ज्यादा स्पष्ट होकर संघर्ष की मूर्तता को ग्रहण करना था। पर यहाँ भारतीय आज़ादी के संभावनाशील आंदोलन के अन्त का वह युग जिसके शिकार खुद विचारवान समाजशास्त्री अम्बेडकर भी हुए ही, इसकी सीमा बना है। और इसी वजह से संघर्ष की जनवादी दिशा को बल प्रदान करने की बजाय यथास्थितिवाद की जकड़ ने संघर्ष की उस जनवादी चेतना को दलित आदिवासी गठजोड़ के रूप में बदलकर उसे एक मूर्त रूप देने की बजाय उससे परहेज किया है और अभी तक के तमाम प्रगतिशील आंदोलन की वह राह जो मध्यवर्गीय जीवन की चाह के साथ ही दिखाई दी, अटकी हुई है। हाँ, वर्षों की गुलामी के जुए को उतार फेंकने की आवाज़ें जरूर स्पष्ट हुई हैं। हिचक, संकोचपन और दब्बू बने रहने की बजाय जातिगत आधार पर चौथे पायदान की यह हलचल एक सुन्दर भविष्य की कामना के लिए तत्पर हो और ज्ञान विज्ञान के सभी क्षेत्रों की पड़ताल करते हुए मेहनतकश आवाम के जीवन की खुशहाली के लिए भी संघर्षरत हो, नागार्जुन की कविता ’हरिजन गाथा’ का एक यह पाठ तो बनता ही है।

संघर्ष के लिए लामबंदी को शुरूआती रूप में ही हिंसक ढंग से कुचलने की कार्रवाइयों की ख़बरे कोई अनायास नहीं मिलतीं। उच्च जाति के साधन सम्पन्न वर्गो की हिंसा को (जो बेलछी से झज्जर तक जारी है ) इन्हीं निहितार्थों में समझा जा सकता है।

नागार्जुन की कविता ’हरिजन गाथा’ कि ये पंक्तियाँ समाजशास्त्रीय विश्लेषण की डिमांड करती हैं। नागार्जुन उस सभ्य समाज से, जो हरिजनउद्वार के समर्थक भी हैं, प्रश्न करते हुए देखें जा सकते हैं --

"ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
हरिजन माताएँ अपने भ्रूणों के जनकों को
खो चुकी हों एक पैशाचिक दुष्कांड में
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था।"
"एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं
तेरह के तेरह अभागे
अकिंचन मनुपुत्र
जिन्दा झोंक दिये गये हों
प्रचण्ड अग्नि की विकराल लपटों में
साधन सम्पन्न ऊंची जातियों वाले
सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा !"
"ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
महज दस मील दूर पड़ता हो थाना
और दारोगा जी तक बार-बार
ख़बरें पहुँचा दी गई हों संभावित दुर्घटनाओं की"

नागार्जुन समाजिक रूप से एक जिम्मेदार रचनाकार हैं। वे अमानवीय कार्रवाइयों का पर्दाफाश करना अपने फ़र्ज समझते हैं और श्रम के मूल्य की स्थापना के चेतना से सम्पन्न कवि हो जाते हैं। खुद को हारने में जीत की खुशी का जश्न मानने वाली गतिविधि के बजाय वे सवाल करते हैं। हिन्दी कविता का यह जनपक्ष रूप ही वह आरम्भिक बिन्दु भी है। सामाजिक बदलाव के सम्पूर्ण क्रान्ति वाले रूप को ऐसी ही रचनाओं से बल मिला है। वे रचनाएँ उस नवजात शिशु चेतना के विरुद्ध हिंसक होते साधन-सम्पन्न उच्च जातियों के लोगों से आतंकित नहीं होती बल्कि उनसे हमें सचेत करती है तथा नई चेतना के पैदा होने की अवश्यम्भाविता को चिहि्नत करती है--

"श्याम सलोना यह अछूत शिशु
हम सब का उद्धार करेगा
आज यह सम्पूर्ण क्रान्ति का
बेड़ा सचमुच पार करेगा
हिंसा और अहिंसा दोनों
बहनें इसको प्यार करेंगी
इसके आगे आपस में वे
कभी नहीं तकरार करेंगी..."


2 टिप्‍पणियां:

  1. विजय गौड़ जी ने इस कविता के सन्दर्भ में दलित विमर्श की जो पड़ताल की है वह विचारणीय है। दलित मूल के लेखकों में आक्रोश स्वाभाविक है परन्तु मुझे प्रतीत होता है कि कुछ दलित लेखकों में यह पूर्वाग्रह या दुराग्रह घर कर गया है कि तथाकथित उच्चवर्ण के जिन लेखकों ने दलितों के मुद्दे उठाये हैं वह उनका ढोंग है या दलित आन्दोलन को भोथरा कर देने की चाल है। निराला, नागार्जुन या प्रेमचन्द सभी को कटघरे में डालने का प्रयत्न होता है।
    नागार्जुन फक्कड़ अवश्य दिखते हैं परन्तु अपनी प्रतिबद्धता के प्रति दृढ़ और सचेत हैं। अपनी कविता ’प्रतिबद्ध हूँ’ में कहते हैं
    "प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ प्रतिबद्ध हूँ -
    बहुजन समाज के अनुपल प्रगति के निमित्त
    संकुचित ’स्व’ की आपाधापी के निशेधार्थ
    अविवेकी भीड़ की ’भेड़िया धसान’ के खिलाफ
    अंध-बधिर ’व्यक्तियों’ को सही राह दिखलाने के लिये
    अपने आप को भी ’व्यामोह’ से बारम्बार उबारने के लिये
    प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ शतधा प्रतिबद्ध हूँ।"
    यह कविता नागार्जुन की निष्ठा और ईमानदारी का दस्तावेज है।
    १९७५ में लिखी इस कविता में उनकी प्रतिबद्धता ’बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के लिये है।’ बहुजन समाज शब्द उल्लेखनीय है, जो उनके चिंतन के क्षितिज को प्रदर्शित करता है जिसमें दलित, आदिवासी के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है।
    शायद यही चेतना उन्हे १९७७ के नरसंघार पर हतप्रभ कर देती और वह बोल उठते हैं।
    "ऎसा तो कभी नहीं हुआ था !"
    विजय जी को धन्यवाद! कि उन्होने नागार्जुन की इस मर्मस्पर्शी रचना के माध्यम से उन्हे स्मरण करने एवं दलित समाज की कसमसाहट पर विचार करने का अवसर दिया। अभार!

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  2. अच्छी लगी विजय जी की स विस्तार की हुई समीक्षा - आभार !
    - लावण्या

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