रविवार, 5 अप्रैल 2009

अँधेरी खाइयों के बीच / कुँअर बेचैन


दुखों की स्याहियों के बीच
अपनी ज़िंदगी ऐसी
कि जैसे सोख़्ता हो।

जनम से मृत्यु तक की
यह सड़क लंबी
भरी है धूल से ही
यहाँ हर साँस की दुलहिन
बिंधी है शूल से ही
अँधेरी खाइयों के बीच
अपनी ज़िंदगी ऐसी
कि ज्यों ख़त लापता हो।

हमारा हर दिवस रोटी
जिसे भूखे क्षणों ने
खा लिया है
हमारी रात है थिगड़ी
जिसे बूढ़ी अमावस ने सिया है
घनी अमराइयों के बीच
अपनी ज़िंदगी,
जैसे कि पतझर की लता हो।

हमारी उम्र है स्वेटर
जिसे दुख की
सलाई ने बुना है
हमारा दर्द है धागा
जिसे हर प्रीतिबाला ने चुना है
कई शहनाइयों के बीच
अपनी ज़िंदगी
जैसे अभागिन की चिता हो।

कविता कोश के पन्नों को पलटते हुए मेरी
दृष्टि एक गीत पर पड़ी तो फिर आगे नहीं बढी, ठहर ही गई। जिन्दगी को लेकर शायद ही कोई कवि हो ,जिसने कुछ न लिखा हो,पर इतने अच्छे प्रतीक और शब्दों का सामंजस्य पूर्ण प्रयोग कहीं नही देखने मिला। देखें ॰॰

दुखों की स्याहियों के बीच
अपनी ज़िंदगी ऐसी
कि जैसे सोख़्ता हो।

नये प्रतीक और प्रतिमानों से युक्त आधुनिक उपमाओं से सज्जित यह गीत श्रेष्ठ नवगीत की श्रेणी में आता है.। सहज शब्द विन्यास और भाषा की सरलता इसे अत्यन्त बोधगम्य बना देता है।

हमारी उम्र है स्वेटर
जिसे दुख की
सलाई ने बुना है
हमारा दर्द है धागा
जिसे हर प्रीतिबाला ने चुना है

प्रत्येक कवि का कविता लिखने का एक उद्देश्य होता है , लेकिन बहुत कम ही कवि उसमें सफल हो पाते है। इस गीत के माध्यम से कवि अपना संदेश हृदय तक पहुंचाने में पूर्ण सफल हुआ है।

हमारा हर दिवस रोटी
जिसे भूखे क्षणों ने
खा लिया है
हमारी रात है थिगड़ी
जिसे बूढ़ी अमावस ने सिया है
घनी अमराइयों के बीच
अपनी ज़िंदगी,
जैसे कि पतझर की लता हो।

दिन और रात का निरंतर बीतना ही जिंदगी है परन्तु एक आम आदमी अपना पूरा दिन रोटी की जुगाड़ में बिता देता है क्योंकि उसे अपने और अपने परिवार के पेट की भूख मिटानी है, कवि ने इस त्रासदी को कितनी सपाट बयानी के साथ कह दिया है-

हमारा हर दिवस रोटी / जिसे भूखे क्षणों ने / खा लिया है
रात की थिगड़ी को अमावस ने सिया है........ अमावस दुख का प्रतीक है परन्तु कवि ने अमावस के साथ "बूढ़ी" विशेषण लगाकर यह संकेत भी दे दिया है कि इस दुख की उम्र थोड़ी ही है ........

गीत की सभी विशेषताओं को समेटे, झरने के प्रवाह की तरह कल कल करता यह गीत जीवन की सत्यता को उद्घाटित करता है। इस नवगीत के रचयिता गीत की दुनिया के बादशाह डा.कुँअर बेचैन हैं। कुँअर बेचैन के गीत पढने में जितने अच्छे लगते है् ,सुनने में चार गुना ज्यादा अच्छे लगते हैं।

जो लोग गीत लिखना चाहते हैं उन के लिये कुँअर बेचैन के गीतों को पढना अनिवार्य होना चाहिये |

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ले - शास्त्री नित्यगोपाल कटारे


कुँअर बेचैन जी की यह और बहुत सी अन्य कविताएं आप कविता कोश पर यहाँ पढ सकते हैं ।



7 टिप्‍पणियां:

  1. माननीय कटारे जी की समीक्षा पढ़कर गीत का आनन्द और बढ़ गया.
    आभार.

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  2. मुझे कुंवर बेचैन जी को गाजियाबाद में सुनने का मौका मिला है और मैं कह सकता हूँ कि सचमुच उनको सुनने का आनंद पढने के आनंद से कई गुना अधिक होता है. आपने उनकी रचना के साथ न्याय किया है.बधाई.

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  3. Waah !! Kavita to adwiteey hai hi par vivechna bhi bahut hi sundar hai...

    Aabhaar.

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  4. कविता और समीक्षा दोनोँ बेहद सुँदर !!
    -- लावण्या

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  5. जितनी खूबसूरत कविता उतनी खूबसूरत प्रस्तुती!!

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  6. एकदम नई सी उपमाओं को लिए ही सुन्दर कविता !

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