सोमवार, 18 मई 2009

सुख का दुख / भवानीप्रसाद मिश्र




जिन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,
इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,
क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ,
बड़े सुख आ जाएं घर में
तो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूं ।

यहां एक बात
इससॆ भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि,
बड़े सुखों को देखकर
मेरे बच्चे सहम जाते हैं,
मैंने बड़ी कोशिश की है उन्हें
सिखा दूं कि सुख कोई डरने की चीज नहीं है ।

मगर नहीं
मैंने देखा है कि जब कभी
कोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते में
बाजार में या किसी के घर,
तो उनकी आँखों में खुशी की झलक तो आई है,
किंतु साथ साथ डर भी आ गया है ।

बल्कि कहना चाहिये
खुशी झलकी है, डर छा गया है,
उनका उठना उनका बैठना
कुछ भी स्वाभाविक नहीं रह पाता,
और मुझे इतना दु:ख होता है देख कर
कि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाता ।

मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बेटा यह सुख है,
इससे डरो मत बल्कि बेफिक्री से बढ़ कर इसे छू लो ।
इस झूले के पेंग निराले हैं
बेशक इस पर झूलो,
मगर मेरे बच्चे आगे नहीं बढ़ते
खड़े खड़े ताकते हैं,
अगर कुछ सोचकर मैं उनको उसकी तरफ ढकेलता हूँ
तो चीख मार कर भागते हैं,

बड़े बड़े सुखों की इच्छा
इसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है,
कभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया था
अब मैंने उन्हें फोड़ दी है ।

भवानी प्रसाद मिश्र जी यह कविता और बहुत सी अन्य कविताएं कविता कोश पर यहां पढी जा सकती हैं


लेख : शास्त्री नित्य गोपाल कटारे

दुनियाँ की समस्त कविताओं को कथ्य की दृष्टि से दो भागों में बांट सकते हैं। एक है भावात्मक कविता और दूसरी है विचारात्मक कविता। जब व्यक्ति का भाव केन्द्र किसी भावातिरेक से भर जाता है तो वह भाव स्वयं अभिव्यक्त होने लगता है, तब कवि उस भाव को जो कविता का स्वरूप देता है उसे हम भावात्मक कविता कहते है। इसी तरह जब मस्तिष्क में कोई सुन्दर विचार आता है और उसे अभिव्यक्त करने के लिये जो रचना की जाती है उसे विचारात्मक कविता कहते हैं। भावात्मक कविता स्वयं प्रस्फुटित होती है और विचारात्मक कविता सप्रयास और सोद्देश्य रची जाती है।
कविता कैसी होनी चाहिये इस विषय पर साहित्य जगत में वाद॰॰विवाद चलता रहता है।
इस बारे में सबसे अच्छा परिभाषा गोस्वामी तुलसीदास जी ने कुछ इस प्रकार की है॰॰॰॰॰॰
कीरति भणिति भूति भलि सोई ।
सुरसरि सम सब कर हित होई ।।

अर्थात् कीर्ति , कविता और समृद्धि वही अच्छी होती है जो गंगा के समान सबका कल्याण कर सके।
कीर्ति ,कविता और समृद्धि यदि केवल अपने लिये ही हो तो वह दो कौड़ी की है । ऐसी कीर्ति का समाज में, कविता का साहित्य में और समृद्धि का राष्ट्र में कोई स्थान नहीं होता। " हितेन सहितम् साहित्यम् " अर्थात् जिसमें समाज का हित निहित हो उसे साहित्य कहते हैं । अच्छी कविता वही है जो समाज का हित कर सकती हो, भले ही उसमें रस ,छन्द ,अलंकारों का सर्वथा अभाव ही क्यों न हो।
कविता कोश के ऐसी कविता लिखने वाले महान साहित्यकारों में से एक हैं पं. भवानीप्रसाद मिश्र , जिनकी सभी कविताएं विचार प्रधान और समाज को दिशाबोध कराने में समर्थ रही हैं। सन्नाटा ,
सतपुड़ा के घने जंगल और गीत फरोश जैसी कविताओं के माध्यम से समाज को पर्यावरण , इतिहास ,कला और संस्कृति के प्रति संवेदनशील बनाया। उन्हीं की एक कविता है " सुख॰दुख "
सुख और दुख ऐसे द्वन्द्व हैं जो मनुष्य को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं । वह इनके बन्धन से मुक्त नहीं हो पाता। सुख॰॰दुख एक सिक्के के दो पहलू हैं जौ कहीं भी साथ साथ ही जाते हैं । यह अलग बात है कि एक समय में एक ही दिखता है दूसरा छुपा रहता है, और जब सिक्का पलटता है तो दूसरा दिखने लगता हे और पहला छुप जाता है। वास्तव में इन दोनों का ही कोई अस्तित्व नहीं है, मात्र मन का भ्रम है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं॰॰॰
सुख॰॰दुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
तस्मात् युद्धस्व कौन्तेय नैवं पापमवाप्स्यसि।।

अर्थात् हे अर्जुन सुख॰॰दुख़, लाभ॰॰हानि, और जय॰॰पराजय को समान मानकर युद्ध कर फिर पाप नही लगेगा। इस गूढ दर्शन को मिश्र जी ने अपने सहज सरल अन्दाज में किस तरह व्यक्त किया है॰॰॰
जिन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,
इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,

जिस प्रकार दुःख को झेलने के लिए क्षमता चाहिये, वैसे ही सुख को झेलने के लिए भी वैसी ही क्षमता की आवश्यकता होती है। अन्यथा कई ऐसे उदाहरण हैं कि अचानक कोई बड़ी खुशी मिल जाने से उसे झेल नहीं पाये और पंचत्व को प्राप्त हो गए। अतः बड़ा सुख बड़े दुख का कारण भी बन सकता है। इसीलिये कवि सतर्क कर देता है"""
क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ,
बड़े सुख आ जाएं घर में
तो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूं ।

सुख जितना बड़ा होता है समय का सिक्का पलटने पर वही उतने ही बड़े दुःख में बदल जाता है। सुख आने के साथ ही उसके खो जाने का डर भी साथ ही आ जाता है ,जो बड़ा दर्दनाक होता है। कवि के शब्दों में देखिये॰॰॰॰

यहां एक बात
इससॆ भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि,
बड़े सुखों को देखकर
मेरे बच्चे सहम जाते हैं,

कवि एक शाश्वत सत्य का उद्घाटन करना चाहता है कि सुख और दुःख दोनों का ही स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है अपितु वे मन के खिलोने मात्र हैं। सुख और दुख की परिभाषा दर्शन शास्त्र में इस तरह की गई है॰॰॰
" मनोऽनुकूलं कार्यं सुखं मनस्प्रतिकूलं दुःखम् "
अर्थात् जो कुछ मन के अनुसार हो तो सुख होता है ,और जो मन के प्रतिकूल हो तो दुख होता है। जैसे मन प्रति पल बदलता है वैसे ही सुख॰॰दुख बी बदलते रहते हैं। जो व्यक्ति दुख नहीं चाहता उसे सुख की भी तलाश नहीं करना चाहिये। क्यों कि वे पक्के साथी हैं साथ साथ ही आते हैं।

मैंने देखा है कि जब कभी
कोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते में
बाजार में या किसी के घर,
तो उनकी आँखों में खुशी की झलक तो आई है,
किंतु साथ साथ डर भी आ गया है ।

अन्त में कवि इस विषय में गीता का समाधान॰॰॰
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीत राग भय क्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।

अर्थात् जो व्यक्ति दुख आने पर उद्विग्न नहीं होता और सुख आने पर नाचता भी नहीं है ,जिसके राग भय और क्रोध नष्ट हौ जाते हैं वह स्थिर बुद्धि कहलाता हे ।इस परम उपदेश को शिरोधार्य करते हुए कवि निर्णय लेता है॰॰॰

बड़े बड़े सुखों की इच्छा
इसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है,
कभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया था
अब मैंने उन्हें फोड़ दी है ।
इस तरह पं, भवानी प्रसाद मिश्र ने समाज के कल्याण के लिये अच्छे विचारों को अपनी कविता का माध्यम बनाया है। उनकी हर एक कविता कोई न कोई विशिष्ट सन्देश देती है


8 टिप्‍पणियां:

  1. मनुष्य जीवन का आवरण ,
    यह शरीर ही माटी की गगरिया है
    जो फूट जाने पर
    आत्मा 'अविमुक्त का प्रसाद' पुन:
    उस अमित तेज मेँ शामिल हो जाता है
    यही इस कविता मेँ छिपा
    अमरता का सँदेस है -
    बहुत सुँदर 'समीक्षा सँदेश' दिया शास्त्री जी
    - लावण्या

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  2. अच्छी समालोचना प्रस्तुत की है शास्त्री जी ने। साधुवाद!
    भवानी भाई, जैसा कि वे विख्यात थे, ने अपनी भाषा को बहुत सरल, सरस और सटीक रखने का सदैव प्रयत्न किया है। दूसरे सप्तक के अपने वक्तव्य में वे कहते हैं।- ’मैं भगवान से कम बात करता हूं और जब करता हूँ तो रहस्य की तरह नहीं।.....मैंने अपनी कविता में प्रायः वही लिखा है जो मेरी ठीक पकड़ में आ गया। दूर की कौड़ी लाने की महत्त्वाकांक्षा मैंने कभी नहीं की।.....बहुत मामूली रोजमर्रा के सुख-दुख मैंने इसमे कहें हैं, जिन का एक शब्द भी किसी को समझना नहीं पड़ता। "शब्द टप-टप टपकते हैं फूल से; सही हो जाते हैं मेरी भूल से।"’
    भवानी भाई की यही सहजता उनके काव्य की प्राणवायु है जो उनकी प्रत्येक कविता में प्रवहमान रहती है, जिसके कारण वे बड़ी से बडी़ बात बड़ी सहजता से कह जाते हैं और श्रोता उनके इस सरल सम्प्रेषण से अभिभूत हो जाता है।
    सादर!

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  3. भवानी प्रसाद मिश्र की यह कविता बहुत सरल, सहज और बोलचाल की भाषा में लिखी गई है। वास्तव में सरल, सहज, बोलचाल की भाषा में कविता लिखना कठिन ही नहीं बल्कि बहुत कठिन है। और उसे समझना उससे भी कठिन है। क्योंकि ऐसी कविताओं की अनुगूँज बहुत अंदर तक जाती है परन्तु पाठक प्रायः सरल भाषा देखकर उसमें कुछ विशेष तलाशने की कोशिश नहीं करता है।
    जिन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,
    इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,
    ये पंक्तियाँ देखने में बहुत सामान्य सी हैं, लगता है कि इनकी व्याख्या या समीक्षा की आवश्यकता ही नहीं है [किसी ने लिखा भी है] परन्तु ऐसा नहीं है। कवि यहाँ बहुत बड़ी बात कह रहा है- बड़ा सुख न होने का दुख तो है कवि को क्योंकि यह स्वाभाविक है पर ऐसा दुख उसे नहीं है जो उसे विचलित कर दे ....... बहुत कुछ कह दिया है कवि ने यहाँ जिस पर लम्बी टिप्पणी की अपेक्षा है।
    बड़े सुख आ जाएं घर में
    तो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूं ।
    .........
    कटारे जी द्वारा की गई समीक्षा कविता की कई पर्तों को खोलती है ।
    डा० व्योम

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