मंगलवार, 12 मई 2009

एक आँख वाला इतिहास / दूधनाथ सिंह


मैंने कठैती हड्डियों वाला एक हाथ देखा--
रंग में काला और धुन में कठोर ।
मैंने उस हाथ की आत्मा देखी--
साँवली और कोमल
और कथा-कहानियों से भरपूर !
मैंने पत्थरों में खिंचा
सन्नाटा देखा ।
जिसे संस्कृति कहते हैं ।
मैंने एक आँख वाला
इतिहास देखा
जिसे फ़िलहाल सत्य कहते हैं ।

दूधनाथ सिंह जी की यह और अन्य कविताएं आप कविता कोश में यहां पढ सकते हैं ।


लेख : अमिताभ त्रिपाठी

दूधनाथ सिंह जी की एक छोटी किन्तु अत्यन्त चुटीली और प्रभावपूर्ण कविता है "एक आँख वाला इतिहास" । इतिहास की विडम्बना है कि इसे सदैव सत्तासीन शक्तियों द्वारा लिखवाया जाता है। जिसमें वह बहुत कुछ नहीं होता जिस पर वह युग, वह समाज यहाँ तक कि वह सत्ता भी निर्भर करती है। सत्तासीनों की मति और अभिमत से लिखवाये गये ये इतिहास कुछ परिवारों की शौर्यगाथाओं, पारस्परिक वैमनस्यों, उनके बैभव एवं विलासिताओं, उनकी निर्मितियों, आस्थाओं, पूर्वाग्रहों आदि के लेखे-जोखे मात्र हैं। इसमें वह बहुसंख्यक जन कहीं नहीं है किसके श्रम के दोहन से उन्होने सत्ता का सुख भोगा है। यह परम्परा प्रचीन काल से आज तक चली आ रही है। इस बीच शासन तंन्त्र बदले, शासक बदले, शासितों में भी कुछ परिवर्तन हुये परन्तु सत्तासीनो द्वारा इतिहास को मनोनुरूप लिखवाने के प्रयत्न अब भी जारी हैं। जिसमें आम आदमी और सत्य के अतिरिक्त सब कुछ होता है।
आरम्भ में एक हाथ दिखता है
मैंने कठैती हड्डियों वाला एक हाथ देखा--
रंग में काला और धुन में कठोर ।
मैंने उस हाथ की आत्मा देखी--
साँवली और कोमल
और कथा-कहानियों से भरपूर !
कठैती हड्डियों वाला, काला और धुन में कठोर
कठैती, मजबूती का भी प्रतीक है और सदियों की संवेदना शून्यता का भी यही बात आगे धुन में कठोर से और भी स्पष्ट हो जाती है। धुन में कठोर उस दृढता को भी दर्शित करता है जो उसकी जिजीविषा की वाहक है। काला रंग, वर्ण का उतना प्रतीक नहीं जितना अंधकार में धकेले जाने का। फिर भी उसकी आत्मा साँवली और कोमल है। आत्मा की सरलता और मृदुता का कारण है उसका पारम्परिक कथा और कहानियों से भरा हुआ मन जो सभी कठिनाइयों को सह लेने का सम्बल प्रदान करता है। फलतः उसने नियति से समझौता कर लिया है।
मैंने पत्थरों में खिंचा
सन्नाटा देखा ।
जिसे संस्कृति कहते हैं ।

यह सन्नाटा यथास्थितिवाद का सन्नाटा है। पत्थर उस निस्पन्दता और जड़ता का प्रतीक है जो संस्कृति के नाम पर निरन्तर चली आ रही है। हम मोह्ग्रस्त हैं उसके अनुरक्षण के लिये।
और अन्त में कविता वहाँ पहुँचती है जहाँ के लिये शुरू हुई थी।
मैंने एक आँख वाला
इतिहास देखा
जिसे फ़िलहाल सत्य कहते हैं ।

एकांगी इतिहास हर समय का सत्य रहा है और इसके तले वही रौंदा गया है जिसके पास कलम नहीं थी या उसे ख़रीदने की ताकत नहीं थी। नीरज जी ने भी इतिहास के इस विद्रूप को रेखांकित करते हुये कहा है
उन्ही लोगों ने इतिहास बनाये हैं यहाँ
जिनपे इतिहास को लिखने के लिये वक़्त न था।
इतिहास के ये वास्तविक निर्माता नीव के पत्थरों की भाँति कभी चर्चा में नहीं आते। एक आँख वाला इतिहास इनकी तरफ की आँख मूंदे रहता है। किसी ने सच ही कहा है ’इतिहास एक प्रवंचना है’ (History is a fraud). ’जिसे फ़िलहाल सत्य कहते हैं’ में एक निहितार्थ भी छिपा है कि यह फ़िलहाल सत्य है। भविष्य में इसके असत्य हो जाने की सम्भावना है। कविता इस अदृश्य से आशावाद पर समाप्त होती है।

रवीन्द्र कालिया जी ने लिखा है कि दूधनाथ जी कम लिखते हैं लेकिन जब लिखते तब तबीयत से लिखते हैं। उनके गद्य और पद्य दोनो में यह बात देखी जा सकती है। यह छोटी सी सारगर्भित कविता भी उन्होने तबीयत से लिखी है।

6 टिप्‍पणियां:

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  2. बहुत अच्छी और सटीक समीक्षा प्रस्तुत की गई है दूधनाथ सिंह जी की कविता पर अमिताभ त्रिपाठी द्वारा।
    -डा० व्योम

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  3. बहुत खूब लिखा, बहुत दिनो बाद अच्छी समालोचना या समीक्षा देखने को मिली. आशा है आगे भी आपकी समीक्षा देखने को मिलेगी.

    विकास

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  4. दूधनाथ सिंह जी की कविता एक आँख बाला इतिहास पर श्री अमिताभ त्रिपाठी जी की समीक्षा
    पढी,सच मायने मे जो लोग और परिस्थितियाँ समय को प्रभावित करती हैं वही इतिहास होती हैं,इतिहास
    के पन्नो मे बहुत कुछ छूटते रहा है ,हो सकता है भविष्य मे दर्ज किया जा सकेगा ।
    कमलेश कुमार दीवान

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  5. आदरणीय
    जब पहली बार ये कविता पढ़ी, निराला जी की "वह तोड़ती पत्थर" की याद आ गई.
    बाद में अमित जी की समीक्षा पढ़ी, तो कविता के बहुत से छुपे आयाम ज्यों उजागर हो गए.
    धन्यवाद आपका, एक अनूठी कविता के चयन और सार्थक समीक्षा के लिए.
    सादर शार्दुला

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  6. भार्गव जी आपका चयन एवं प्रस्तुति सराहनीय है

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